सोमवार, 25 सितंबर 2023

दोहा संग्रह

 भोर हुई दिन चढ़ गया, खग भी गाते गान।

त्यागो निद्रावेश जन , अब तो खुद को जान।।


ये साल भी बीत गया,नहीं मिली पर ठौर।

कोरोना के काल में,जाऊ मैं *किस और*।।


छोटे से एक गांव में,रहता नवल किशोर।

लोकार्पण पुस्तक का,नाम है *किस और*।।


माँ मूरत है स्नेह की, माँ जीवन का सार।

माँ मेरी पहचान है, माँ मेरा आधार।।


दूर रहे अज्ञानता, हो चित ज्ञान प्रकाश।

भक्ति भाव मिलता रहे, मुझको माँ से आस।।


उमड़ घुमड़ बादळ चल्यौ, चांद छुप्यौ गिगनार ।

जागै जा की ज़ीत हैं , सोवैं जा की हार।।


बढ़ता पेड़ बबूल का, कांटे ही बरसाय

डाली पर डाली लगी, फूल कहाँ पर आय


पत्थर पड़ा जमीन पर,दर दर ठोकर खाय

बने देव खा चोट को,हर जन शीश नवाय


नरकासुर का वध किया, उत्तम भये विचार।

चतुर्दर्शी थी रूप की, सजता रूप अपार।।


हिंदी है मेरा हिंदुस्तान


 *हिंदी है मेरा हिंदुस्तान*


वागीशा वंदन है हिंदी, माथे का चंदन हिंदी।

पन्ना का नंदन है हिंदी,गोरो का मर्दन हिंदी।।


सूरदास की वाणी में बस, भक्ति भाव सिखाती है।

तुलसी से तुलसीकृत होकर, रामायण बन जाती है।।


रस की खान रसखान में, मृदुल बनी है मीरा में।

दोहे बन कर उपजी हिंदी, सुबोध संत कबीरा में।।


अम्बर का पानी फुनगी पर, ओस बन चमचमाता है।

पुष्प खिले हो उपवन में तो, भंवरा गुनगुनाता है।।


अंग्रेजो की अंग्रेजी का, हमने था सम्मान किया।

हुए अत्याचार हिंदी पर, हमनें सीना तान लिया।।

 

हिंदी भाषा सीने में रख, मन ही मन इठलाता हूँ।

मुझे नहीं गाना इलू इलू, वन्दे मातरम् गाता हूँ।।


नहीं किसी से नफरत मुझको,नही मुझमे है अभिमान।

मां हिंदी है भाषा मेरी, हिंदी है मेरा हिंदुस्तान।।


रचनाकार

कवि दिनेश तूफानी, सिकन्दरा

दौसा, राजस्थान

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