भोर हुई दिन चढ़ गया, खग भी गाते गान।
त्यागो निद्रावेश जन , अब तो खुद को जान।।
ये साल भी बीत गया,नहीं मिली पर ठौर।
कोरोना के काल में,जाऊ मैं *किस और*।।
छोटे से एक गांव में,रहता नवल किशोर।
लोकार्पण पुस्तक का,नाम है *किस और*।।
माँ मूरत है स्नेह की, माँ जीवन का सार।
माँ मेरी पहचान है, माँ मेरा आधार।।
दूर रहे अज्ञानता, हो चित ज्ञान प्रकाश।
भक्ति भाव मिलता रहे, मुझको माँ से आस।।
उमड़ घुमड़ बादळ चल्यौ, चांद छुप्यौ गिगनार ।
जागै जा की ज़ीत हैं , सोवैं जा की हार।।
बढ़ता पेड़ बबूल का, कांटे ही बरसाय
डाली पर डाली लगी, फूल कहाँ पर आय
पत्थर पड़ा जमीन पर,दर दर ठोकर खाय
बने देव खा चोट को,हर जन शीश नवाय
नरकासुर का वध किया, उत्तम भये विचार।
चतुर्दर्शी थी रूप की, सजता रूप अपार।।