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नीलकंठ भोलेनाथ,गंगाधर गौरीनाथ
मन में हे! पशुपति,
आशा बन जाइये।।
होवे नहीं बुरे काम,होवे रोज अच्छे काम
मेरे नयनों की तुम,
छवि बन जाइये।।
छाई जग में निराशा,तुम से ही बस आशा
नफरत का जहर,
तुम ही पी जाइये।।
करो विश्व का कल्याण, मेरे प्यारे विश्वनाथ
महा शिवरात्रि पर,
वास कर जाइये।।
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*-:रचनाकार:-*
*कवि दिनेश तूफानी,सिकन्दरा*
*दौसा(राजस्थान)*