रविवार, 1 मई 2022

मैं एक मजदूर हूँ।


 *मैं एक मजदूर हूँ*


पेट भरने को मैं इतना क्यों मजबूर हूँ।

तुम मालिक हो और मैं एक मजदूर हूँ।


तन ढकने को वही फटा पुराना लिबास

कंधे पर पड़े हुए बोझ का है अहसास।


खुले आकाश की धुप और तपती धरती

ये जिंदगी मुझसे निरन्तर सवाल करती।


गरीबी लाचारी ने मुझे हँसना भुला दिया

बच्चों के पापी पेट ने भी मुझे रुला दिया।


हाथो में पड़े छाले पैरो में फटी बिवाई है

तब मुझे दो वक्त की रोटी मिल पाई है।


धधकते हुए सूरज से आँख मिलाता हूँ

तब जाकर मैं बच्चों का पेट भर पाटा हूँ।


पर्वत काट काट कर मैने सड़क बनाई

उसी सड़क पर तुमने गाडी फिर दौड़ाई।


सड़क पर नंगे पैर चलने को मजबूर हूँ

साहब सुविधाओं से दूर एक मजदूर हूँ।


अभावों में पला बड़ा फिर भी भरपूर हूँ 

तुम मालिक हो और मैं एक मजदूर हूँ।


-: रचनाकार :-

कवि दिनेश कुमार प्रजापति"तूफानी"

सिकन्दरा,दौसा

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