*कह मुकरी*
यह विधा चार पंक्तियों की रचना है। इस विधा में दो सखियों परस्पर वार्तालाप करती है। जिसकी प्रथम तीन पंक्तियों में एक सखी अपनी दूसरी अंतरंग सखी से अपने साजन/पति के बारे में अपने मन की कोई बात कहती है। परन्तु यह बात कुछ इस प्रकार कही जाती है कि अन्य किसी बिम्ब पर भी सटीक बैठ सकती है। जब दूसरी सखी पहली से यह पूछती है कि क्या वह अपने साजन के बारे में बतला रही है, तब पहली सखी लजा कर चौथी पंक्ति में अपनी कही बात से मुकरते हुए कहती है कि नहीं वह तो किसी दूसरी वस्तु के बारे में कह रही थी ! इस प्रकार कह कर मुकर जाने वाली *कह मुकरियां* प्रेषित है।
साँझ पड़े वो घर पर आवे
आवे मन शीतल हो जावे
देख उसे मन में आनंदा।
क्या सखि साजन.? ना सखि चंदा!
सोऊँ लिपट लगे ना जाड़ा
दिल से नरम देह से गाढा
ठण्ड वास्ते पलंग सजाई
क्या सखि साजन.? न सखि रजाई!
नाक मुँह को वही छुपावे
कोरोना को दूर भगावे
पूरा करते है जब टास्क
क्या सखि साजन.? ना सखि मास्क!
शादी में वा धूम मचावे
जब जब बोले तान छुडावे
प्यारे लागे वा के बोल
क्या सखि साजन.?ना सखि ढोल!
*-:रचनाकार :-*
*कवि दिनेश तूफानी,सिकन्दरा*
*दौसा (राजस्थान)*