*चौपाई छन्द*
ज्येष्ठ भ्राता अनुज अनुरूपा,
निज नगर नहीं कोई दूजा।
देख छवि गयी मैं बलिहारी,
रूप अनोखा है अति भारी।
पुर नूतन पीताम्बर साजे,
बाएं बाहु कमान विराजे।
चौदहों भवन तीनों लोका,
ऐसा रूप कबहुँ नहीं देखा।।
*रचनाकार*
*कवि दिनेश तूफानी,सिकन्दरा*
*दौसा (राजस्थान)*