पिता की प्यारी चाव है बेटी
मत पडने दो छाया दरिंदो की
क्योंकि पेड़ों सी छांव है बेटी
बहती नदी का कूल है बेटी
बड़े बरगदो का मूल है बेटी
क्यों तोड़ते हो मासूम कली को
आंगन का खिला फूल है बेटी
लक्ष्मी सी करामात है बेटी
सूखे में भी बरसात है बेटी
क्यों लूटते हो इज्जत किसी की
भाई बहन का साथ है बेटी
माता का श्रृंगार है बेटी
घर महके वो बयार है बेटी
मत मारना कभी कोंख में को इनको
क्योंकि खुद घर संसार है बेटी
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