*छन्द मुक्त कविता*
सुना है,दीवारों के कान है
अगर कान है तो सुनती भी होगी
सुनती है तो बोलती भी होगी।
जब दीवारें बोलती है घर की,
तो बाहर तक आवाजें जाती है।
कान लगा कर देखो दीवार पर,
कम्पन्न सुनाई देता है।
सुनो ध्यान से कंठों से निकला
रुदन सुनाई देता है।
जिन घरों की बोलती है दीवारें
उन घरों में विनाश दिखाई देता है।
दीवारों को मत सुनाओ
मत सुनाओ क्या?
दो भाइयों के बीच दीवार
ही मत बनाओ।
ना होगें कान,ना होगी दीवार,
और ना ही होगी कभी तकरार,
जिस घर में नहीं पड़ेगी दरार,
उन में बरसेगा भरपूर प्यार।
रचनाकार:-
कवि दिनेश तूफानी,सिकन्दरा

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