शुक्रवार, 10 जून 2022

किसान की पीड़ा

 *किसान की पीड़ा*


मैने सींचा लहू पसीना, 

अर्पण किया सारा जीवन।

तन मन सब कुछ त्यागा मैने,

तब मिला है तुम्हे संजीवन।।


तपती धरा तपता आसमा,

कठिन परिश्रम मैं करता।

तभी भूख से व्याकुल मानव,

अपना पुष्पपथ है भरता।।


हम तो विज्ञापन है सत्ता के,

हर बार दिखाये जाते।

हम जीते रहे गरीबी में,

और नेता सत्ता पाते।।


आते ही सत्ता, भूल जाते,

ये खादी टोपी वाले।

मलहम लगाने का इन्तजार,

हाथो में पाये छाले।।


उम्मीदों पर फिर गया पानी ,

मिल रही हमको निराशा।

अमीरो की कोटियाँ भरने,

समझा है हमें धनाशा।।


अब तो समझो मेरी पीड़ा,

सज्जनों मत रहो तुम मौन,

पहचानो मुझको भी अब तुम,

आखिर मैं हूँ यारो कौन?


-:रचनाकार:-

कवि दिनेश कुमार प्रजापत"तूफानी"

सिकन्दरा,दौसा(राजस्थान)



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